जूनून-ए-इश्क़

अब भी कांपते हाथों से दिल के दरारों को सी लेती हूँ ।
अब भी दबे लबों से अश्क़ों के घूँट मैं पी लेती हूँ ॥

इस बेनुमाइंदगी का कोई तो मुक़ाम होगा ।
इस बेदिली का कभी तो कोई इन्तेक़ाम होगा ॥

बेबसी के इस आलम में दिल का ज़ोर बेशुमार है ।
इंतज़ार है न खत्म होने वाली और करना मुझे इख्तियार है ॥

सिलसिला हमारी कहानियों का हर जुबां पे आम होगा ।
बेआबरू मेरा जूनून-ए-इश्क़ अब सर-ए-आम होगा ॥

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