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उन् में…

उन् में खुद को खो देना चाहती हूँ |
उन् बिन खुद को फिर से खोने की चाहत में पाती हूँ ||

एक बार फिर डूबना चाहती हूँ |
उन् आँखों में डूबके जीना चाहती हूँ ||

दर्द-ए-आशिकी सहना चाहती हूँ |
रूह में उनके मेहफ़ूज़ रहना चाहती हूँ ||

इश्क़ में उनके रोशन लुट्ना चाहती हूँ |
या इसी कोशिश में अपना दिल लुटाना चाहती हूँ ||

क़ायनात भर की बातें करना चाहती हूँ |
आँखों से हो बातें सो चुप रहना चाहती हूँ ||

मिलान को उनसे तड़पना चाहती हूँ |
तड़प पनपे उतनी दूर न रहना चाहती हूँ ||

न जाने ग़ैर मुनतमिन मैं क्या चाहती हूँ |
बस इतना इल्म है हर दुआ-ए-क़ुनूत में बस उन्हें चाहती हूँ ||